सरकारी कोष से वेतन पाने वाले अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में क्यों नहीं पढ़ा रहे? यूपी के मुख्य सचिव को सुप्रीम कोर्ट का अवमानना नोटिस

रबीअ बहार

अगस्त 2015 में इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा लिए फैसले के मुताबिक सभी सरकारी कर्मचारियों, विधायकों और सांसदों के बच्चे सरकारी स्कूलों में ही पढ़ेंगे। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने चीफ सेक्रटरी को इस फैसले पर अमल करने के निर्देश दिए थे। प्राथमिक स्कूलों की दयनीय हालत देखते हुए दायर की गई एक याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि सरकारी कर्मचारियों, नौकरशाहों, स्थानीय निकायों के पदाधिकारियों, विधायकों, सांसदों और न्यायपालिका से जुड़े लोगों के बच्चे अब उनके स्थानीय वार्ड के सरकारी स्कूलों में ही पढ़ाए जाएंगे।

इस फैसले को सरकार ने पिछले 4 बाद भी लागू नहीं किया। इस को लागू करवाने के लिए याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए और उत्तर प्रदेश में सरकारी प्राथमिक विद्यालयों की दशा सुधारने के लिए सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाने के आदेश पर अमल न किये जाने पर उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव अनूप चंद्र पांडेय को अवमानना नोटिस जारी किया है। हालांकि कोर्ट ने पांडेय को अगली सुनवाई पर निजी तौर पर कोर्ट में पेश रहने से छूट दे दी है।

न्यायमूर्ति एके सीकरी व न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर की पीठ ने गत एक फरवरी को याचिकाकर्ता शिव कुमार त्रिपाठी की ओर से दाखिल अवमानना याचिका पर सुनवाई के बाद ये नोटिस जारी किया। याचिका में मांग की गई है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के 18 अगस्त 2015 के आदेश पर आज तक अमल न किये जाने पर प्रदेश के मुख्य सचिव के खिलाफ अवमानना कार्यवाही होनी चाहिए।

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि मुख्य सचिव ने हाईकोर्ट के आदेश को लागू करने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाए। याचिकाकर्ता का कहना है कि उसने मुख्य सचिव के समक्ष ये मुद्दा उठाया था ताकि यूपी बेसिक एजूकेशन बोर्ड द्वारा चलाए जा रहे प्राथमिक स्कूलों की हालत सुधरे। जब मुख्य सचिव ने आदेश पर कार्रवाही नही की तो उन्होंने मुख्य सचिव के खिलाफ हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दाखिल की थी, लेकिन हाईकोर्ट ने तथ्यों पर गंभीरता से विचार किये बगैर ही याचिका खारिज कर दी।

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका मे कहा गया है कि यह मामला गरीब लोगो के बच्चों की पढ़ाई से जुड़ा है। प्रदेश सरकार ने आज तक आदेश पर अमल नहीं किया है इसलिए सुप्रीम कोर्ट उत्तर प्रदेश सरकार को हाईकोर्ट के आदेश का पालन करने का निर्देश दे।

क्या था हाईकोर्ट का आदेश

हाईकोर्ट ने 18 अगस्त 2015 के आदेश में यूपी बेसिक शिक्षा बोर्ड के स्कूलों की खराब स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा था कि ब्यूरोक्रेट, नेताओं और अमीर लोगों के बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं इसलिए ये लोग इन सरकारी स्कूलों का स्तर बनाए रखने पर ध्यान नहीं देते।

हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को निर्देश दिया था कि वह अन्य जिम्मेदार अधिकारियों के साथ परामर्श से उचित कार्रवाई कर यह सुनिश्चित करे कि सरकारी कर्मचारी, अर्ध सरकारी कर्मचारी, स्थानीय निकाय के प्रतिनिधि, न्यायपालिका और अन्य सभी लोग जो सरकारी कोष से वेतन या लाभ लेते हैं, के बच्चे प्राथमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा संचालित प्राथमिक विद्यालय में पढ़ें।

कोर्ट ने मुख्य सचिव से कहा था कि इस शर्त का उल्लंघन करने वालों पर दंड के प्रावधान भी सुनिश्चित किये जाएं। उदाहरण के तौर पर अगर कोई सरकारी कर्मचारी अपने बच्चे को सरकारी बोर्ड की ओर से संचालित प्राथमिक विद्यालय के बजाए किसी अन्य निजी स्कूल में पढ़ाता है तो वह उस निजी स्कूल में दी जा रही फीस के बराबर पैसा हर महीने सरकारी कोष में जमा कराएगा और ये काम तबतक जारी रखेगा जबतक उसका बच्चा निजी प्राथमिक स्कूल में पढ़ेगा। इस एकत्रित धन को बोर्ड द्वारा संचालित स्कूलों की बेहतरी में खर्च किया जाएगा। इतना ही नहीं हाईकोर्ट ने कहा था कि नौकरी मे रहने वाले उस सरकारी कर्मचारी की निश्चित समय के लिए वेतन वृद्धि व प्रोन्नति आदि भी रोकी जा सकती है।

कोर्ट ने मुख्य सचिव को इन निर्देशों को अगले शैक्षणिक सत्र से लागू करने के लिए प्रभावी कदम उठाने का आदेश दिया था। साथ ही छह महीने बाद आदेश पर अमल की रिपोर्ट देने को कहा था।