सुप्रीम कोर्ट की मायावती पर टिप्पणी: बात निकली है तो दूर तलक भी जाएगी

2009 में दाखिल सार्वजनिक हित की एक याचिका पर सुनवाई करते समय सुप्रीम कोर्ट ने राय व्यक्त की है कि मायावती को लखनऊ और नोएडा में अपनी व हाथियों की प्रतिमाओं को लगाने में खर्च किया गया जनता का पैसा सरकारी खजाने में जमा करा देना चाहिए। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि सार्वजनिक धन का प्रयोग अपनी मूर्तियां बनवाने और राजनीतिक दल का प्रचार करने के लिए नहीं किया जा सकता है। बताते चलें कि उस समय लगभग 6000 करोड़ रूपए खर्च हुए थे इस काम पर ! यह दूसरी बात है कि दस साल पुराने मामले में ठीक आम चुनाव से पहले ऐसे किसी ‘फैसले’ का आना कुछ शंकाओं की वजह जरूर बन जाता है।

बहन मायावती के दो ट्वीट भी आ गए हैं इस पर :

1. ‘मीडिया कृप्या करके माननीय सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को तोड़-मरोड़ कर पेश ना करे। माननीय न्यायालय में अपना पक्ष ज़रूर पूरी मजबूती के साथ आगे भी रखा जायेगा। हमें पूरा भरोसा है कि इस मामले में भी मा. न्यायालय से पूरा इंसाफ मिलेगा। मीडिया व बीजेपी के लोग कटी पतंग ना बनें तो बेहतर है।’

2. ‘सदियों से तिरस्कृत दलित व पिछड़े वर्ग में जन्मे महान संतों, गुरुओं व महापुरुषों के आदर-सम्मान में निर्मित भव्य स्थल / स्मारक / पार्क आदि उत्तर प्रदेश की नई शान, पहचान व व्यस्त पर्यटन स्थल हैं, जिसके आकर्षण से सरकार को नियमित आय भी होती है।’

कोर्ट में सभी को छूट है अपना पक्ष रखने की, मायावती जी भी जरूर रख सकती हैं। उससे हमें कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन प्रसंगवश कुछ बुनियादी सवाल भी उठ खड़े हुए हैं जिन पर जरूर कुछ कहना चाहूंगा ! क्या लोकतंत्र में किसी भी सरकार को जनता की गाढ़ी कमाई को अपने राजनीतिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए खर्च करने का भी अधिकार मिल जाता है? जिस ‘प्रचंड बहुमत’ से यह सरकार बनी है भले ही वह एक तिहाई से भी कम वोट का हो जैसाकि मौजूदा सरकार (31%) से मामले में है, क्या ऐसे बहुमत से उसे बड़े पैमाने पर ऐसे खर्च करने का कोई अधिकार मिल जाता है? क्या इस तरह के बड़े और विवादित फैसलों पर किसी तरह की रायशुमारी नहीं होनी चाहिए?

उदाहरण के स्टैच्यू ऑफ यूनिटी यानि सरदार पटेल की प्रतिमा पर 3000 खर्च किए गए और वह भी सरकारी कंपनियों का हाथ मरोड़ कर ! Oil India को 900 करोड़ देने पड़े और ONGC को 500 करोड़, BPCL, IOC और GAIL प्रत्येक को 250 करोड़ देने पड़े। ऐसे ही और भी सार्वजनिक उपक्रम हैं जिन्हें 100, 50 करोड़ मजबूरन योगदान करना पड़ा है। कृपया नोट करें, अदानी, अंबानी, सेठ बाबा रामदेव जैसे किसी भी महान देशभक्त ने इसमें एक कानी कौड़ी का सहयोग नहीं किया है !

ऐसी ही एक महत्वाकांक्षी योजना है छत्रपति शिवाजी की प्रतिमा को अरब सागर में लगवाने की ! सिर्फ प्रतिमाएं ही नहीं, ‘धार्मिक कार्यों’ के लिए भी सरकारी खजाने के इस्तेमाल का सवाल है ! क्या धर्म सरकारी मुद्दा है ? क्या आपके संविधान ने ऐसी किसी कार्यपालिका को मान्यता दी है ? क्या कुंभ मेले जैसे समारोहों को सरकारी तौर पर ‘गोद लेकर’ उनका स्वयंसेवी मूल चरित्र खत्म किया जा सकता है ? टैक्स के रूप में सरकारी खजाने में आने वाला पैसा केवल हिंदुओं के टैक्स से तो आता नहीं है ! तो फिर आस्था के नाम पर बड़े पैमाने पर उनके धार्मिक आयोजनों पर खर्च कैसे किया जा सकता है ? शहरों का नामबदल अभियान भी इसी श्रेणी में आता है क्योंकि उस पर भी तो कई हजार करोड़ का खर्च आता है ! जिस देश की तीस फीसदी जनता फटेहाल जीने को मजबूर हो, वहां ऐसी ऐय्याशी करने की अनुमति दी जा सकती है क्या ?

इसलिए यदि मायावती से ‘बेकार खर्च’ की भरपाई करने के लिए कहा जाता है तो प्रधानमंत्री और ऐसे ही अनाप- शनाप खर्च करने वाले दूसरे मुख्यमंत्रियों से भी इसी तर्ज पर वसूली की जानी चाहिए। जनता ने तो उन्हें चुना था गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी जैसी समस्याएं हल करने के लिए, ‘आस्था’ के सवालों का हल ढूंढने के लिए नहीं !इसलिए भाजपा से भी इस खर्च की वसूली करना ही तर्कसंगत होगा ! इसे केवल एक मामले का फैसला मान कर टाला नहीं जा सकता !

मैं माननीय सुप्रीम कोर्ट की ‘राय’ का स्वागत करता हूं और अपील करता हूं कि दो अप्रैल को दिए जाने वाले उक्त मामले के फैसले में ऐसे ही दूसरे मामलों पर भी अपनी राय दे !

साभार: राजनीतिक विश्लेषक गुरुचरण जी की वाल से