UP में CM कार्यालय को भी लाया जाए लोकायुक्त के तहत ? सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने लोकायुक्त अधिनियम के दायरे में मुख्यमंत्री के कार्यालय को शामिल करने के निर्देश मांगने वाली एक याचिका पर उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से जवाब मांगा है।

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की पीठ ने सोमवार को शिव कुमार त्रिपाठी द्वारा दायर एक याचिका पर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया है। इस याचिका में कहा गया है कि मुख्यमंत्री कार्यालय सहित कई संस्थानों को लोकायुक्त अधिनियम के दायरे से बाहर रखा गया है।

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि राज्य में लोकायुक्त अधिनियम उस उद्देश्य को पूरा करने के लिए प्रभावी और शक्तिशाली नहीं है जिसके लिए इसे लागू किया गया था। ये भी कहा गया कि यह एक्ट मंत्रियों, विधायकों और अन्य लोक सेवकों के खिलाफ शिकायतों और आरोपों की जांच का प्रावधान करने के लिए पारित किया गया था। हालांकि लोकायुक्त या उपलोकायुक्त इस अधिनियम के तहत किसी शिकायत की सीधे तौर पर जांच नहीं कर सकते। शिकायत दर्ज करने के प्रावधानों के अनुसार ही उन्हें जांच के लिए शिकायत भेजी जाएंगी।

इसके अलावा लोकायुक्त किसी भी भ्रष्ट कार्रवाई के लिए मुख्यमंत्री के खिलाफ कार्यवाही करने के लिए सक्षम नहीं है जिसमें उन्हें पक्षपात, भाई-भतीजावाद या अखंडता की कमी का दोषी पाया जाता है। इसलिए भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्यवाही के लिए लोकायुक्त के दायरे में मुख्यमंत्री कार्यालय को भी लाने की जरूरत है।

याचिका में कहा गया है कि भ्रष्ट लोक सेवकों के खिलाफ जांच के मामले में यह अधिनियम प्रभावी नहीं है। लोकायुक्त को जांच के लिए पुलिस अधिकारियों पर ही निर्भर रहना पड़ता है जो राज्य सरकार के नियंत्रण में हैं और इसके लिए कोई स्वतंत्र जांच तंत्र नहीं है। लोकसेवकों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायतों की जांच के लिए लोकायुक्त को अधिक शक्तियों और तंत्र से लैस होना होगा।

त्रिपाठी ने कहा है कि विश्वविद्यालय जैसे अग्रणी संस्थानों को लोकायुक्त के दायरे से बाहर रखा गया है, जबकि इन संस्थानों को भी कानून के दायरे में रखा जाना चाहिए। साथ ही स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के लिए प्रशासनिक नियंत्रण लोकायुक्त के पास होना चाहिए। लोकायुक्त द्वारा अपनी रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपने की कोई समय सीमा नहीं है। इसलिए राज्य सरकार को मुख्यमंत्री के साथ-साथ विभिन्न अन्य संस्थानों को लोकायुक्त के तहत लाने के लिए और अधिक जांच शक्तियों को प्रदान करने के लिए कानून में संशोधन करने के लिए निर्देश दिए जाने चाहिए।