कुंभ: आस्था का संगम या फिर पिकनिक स्पॉट, मीडिया के सच और जमीनी सच में क्या और कितना फर्क होता है पढिये!

न्यूज़ प्लेटफॉर्म के लिए सुशील मानव की रिपोर्ट के मुताबिक मीडिया के सच और जमीन के सच में क्या और कितना फर्क होता है, यह देखना हो तो प्रयागराज में आयोजित हो रहे कुंभ में हो आइए. बाज़ार ने धर्मनगरी को हॉलीडे और पिकनिक स्पॉट में बदल दिया है. चार टेंटसिटी में फुल बॉडी मसाज, फुल बॉडी स्वायल थेरेपी, स्वॉयल स्ट्रिप, लेजर थेरेपी, आदि के लिए हायर की गई एजेंसियां पेशेवर लड़कियों के साथ इन टेंट सिटी में अपनी सेवाएं दे रही हैं.

इन टेंटसिटी में काम करनेवाले कई कर्मचारी नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि सफाई के दौरान अक्सर ही उन्हें कमरे की फर्श पर में इस्तेमाल हुई कंडोम बिस्तर के चद्दर और तकियों पर पर खून, लिप्सटिक के निशान और वीर्य के धब्बे मिलते हैं. इसके अलावा साफ सफाई करनेवालों को इन टेंट सिटी के कमरों से खाने की प्लेटों में छूटा हुआ नॉनवेज फूड, मुर्गें बकरे की हड्डियां व महँगी शराबों की बोतलें भी मिलती हैं.

कहने का लब्बोलुआब ये है कि आस्था की संगम नगरी वीआईपी कुम्भ में हॉलीडे का सुपर मज़ा लेने आ रहे हैं, आस्था उनकी प्राथमिकता नहीं है. उनके हॉलीडे का, कुंभ बजट में पूरा पूरा ख्याल रखा गया है. डीलक्स और सुपरडीलक्स विला बनाए गए हैं. आस्था में भी क्लास का पूरा पूरा ख्याल रखा गया है.

इंद्रप्रस्थम सिटी में ही एक जगह 108 भव्य हवनकुंड बनाए गए हैं. गेस्ट को इन हवनकुंडों तक लिवा जाने का काम लड़कियों के जिम्मे है. साथ ही इन्हें मसाज के लिए लिवा जाने और मसाज देने का काम भी कुंभ में लड़कियों के जिम्मे है. जबकि यूपी की सरकार कुंभ से ही चल रही है.

खुले में सोने को मजबूर है लाखों श्रद्धालु

कुंभ मेले में जहाँ एक ओर मेला वीवीआईपी है. शानदार टैंट सिटी में सुंदर और आरामदायक कॉटेज हैं, भीतर ब्लोवर चल रहे हैं जिनमें रेत या ठण्ड छू भी नहीं सकती. वहीं दूसरी ओर नहावनों पर दूर-दराज से आने वाले लाखों श्रद्धालु आसमान से बरसती शीत और नीचे से चुभती रेत के बर्फ के दरम्यान खुले में सोने को अभिशप्त हैं.

साधन सम्पन्नों और vip लोगो के लिये

मेले में इस बदइंतजामी से लाचार भुक्तभोगी लोग पूछ रहे हैं कि कुंभ में तो बहुत इंतज़ाम सुना था. 4300 करोड़ रुपये फूंकने की होर्डिंग में हंसते प्रधानमंत्री क्या हमारी गरीबी का ही मजाक उड़ा रहे हैं. कुछ नहीं तो दूर दराज से नहाने आने वाले लोगों के लिए बड़े-बड़े पण्डाल बनाने चाहिए थे.

बदहाल आम जनता जो मेले की रौनक बनती है, जिससे कुंभ का वास्तविक स्वरूप बनता है उसके लिए खुले आसमान की ठंड, उपेक्षा और बदइंतजामी के सिवाय कुछ नहीं. बेचारे संगम भी नहीं नहा पा रहे क्योंकि वहां तो वीवीआईपी टेंट सिटी बसा दी गई है. ये लोग योगी मोदी के ‘दिव्य कुंभ भव्य कुंभ’ का शोर सुनकर नहीं आए हैं बल्कि सैकड़ों सालों से ऐसे ही गठरी बांधकर मां गंगा से अपना सुख-दुख बताने चले आते रहे हैं. जैसे तैसे धक्का-मुक्की खाकर वे आते हैं गंगा दर्शन का पुण्य संचित करके वैसे ही धक्का-मुक्का खाते अपने घर वापिस लौट जाएंगे.

छोटी नदी नहीं बचाओगे तो कुंभ कहां लगाओगे

दूसरी ओर ये कुंभ कई आंदोलनों के लिए भी बेहद चर्चित रहा. प्रदूषण, शोषण और अतिक्रमण से छोटी नदियों को बचाने हेतु जल बिरादरी से जुड़े लोगों और संगठनों ने कुंभ मेला में आवाज़ उठाई. प्रदेश के विभिन्न जिलों के 108 छोटी नदियों के जल लाकर कुम्भ में सभी ने संकल्प लिया कि नदियों और अन्य प्राकृतिक जल श्रोतों को बचाने हेतु देश-प्रदेश में संगठित अभियान चलाएंगे.

इसके अलावा मशाल जुलूस निकालकर कुंभ में आए ऋषि मुनियों से नदी बचाने में सहयोग मांगा. मशाल जुलूस में शामिल लोगों ने एक स्वर में कहा कि गंगा को साफ करना है तो छोटी नदियों को बचाना होगा. आमी बचाओ मंच के अध्यक्ष और पूर्वांचल नदी मंच के विश्व विजय ने कहा, “गांव की गंगा को बचाए बिना देश की गंगा को नहीं बचाया जा सकता.”

सफाईकर्मियों का आंदोलन

इस बार कुंभ मेले में सफाईकमी अपनी मांगों को लेकर लगातार आंदोलनरत हैं. 26 जनवरी को सफाई कर्मियों ने कुंभ क्षेत्र में एक बड़ा आंदोलन भी खड़ा करने के लिए अपनी तमाम मांगों को लेकर सफाई कामगार मेला प्राधिकरण के दफ्तर पर जमा हुए थे. गणतंत्र दिवस के अवसर पर मेला प्रशासन ने मेले में धारा 144 लगाकर किसी भी तरह के धरना प्रदर्शन पर रोक लगा दी थी.

बहरहाल, हाड़ कंपकंपाने वाली ठंड में अपर्याप्त कपड़ों और अपर्याप्त व्यवस्था के बीच 12- 20 घंटे काम करने वाले ये सफाई कामगार अपनी मेहनत का उचित दाम पाने को भी तरस रहे हैं. आंदोलनरत सफाईकर्मियों की मांग है कि काम के घंटे आठ घंटे निर्धारित की जाए. इससे अधिक समय तक काम कराने की स्थिति में ओवर टाइम दिया जाए. साथ ही दिहाड़ी बढ़ाकर 600 रुपये की जाए. सफाई कामगारों की यह भी मांग है कि उन्हें वेतन चेक या खाते के माध्यम से नहीं बल्कि नकद दिया जाए.

सफाई कामगारों के हालात देखें तो पता लगता है कि कुम्भ मेला में “मैला उठाने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास नियम 2013” का खुला उल्लंघन हो रहा है. कुंभ में सफाईकर्मी बगैर जूते, दस्ताने, मास्क के काम कर रहे हैं. कोई दुर्घटना बीमा तक नहीं है जबकि अब तक करीब 60 सफाईकर्मी दुर्घटना में घायल हो चुके हैं.

आंकड़ों के मुताबिक मेले में सवा लाख टॉयलेट और करीब 25-30 हजार सफाईकर्मी हैं. जिनसे दो तरह के सफाई के काम लिए जा रहे हैं- शौचालय की सफाई और सड़क की सफाई और कूड़ा उठाना. टॉयलेट की सफाई और मल निस्तारण का काम प्राइवेट कम्पनियां करवा रही हैं जबकि सड़क की सफाई और कूड़ा निस्तारण का काम स्वास्थ्य विभाग करवा रहा है.

सरकार और प्राइवेट कम्पनी दोनों ही किसी दबंग ज़मादार या ठेकेदार के मार्फत ही सफाईकर्मियों की नियुक्ति करती हैं. सफाई कामगार संगठन और अन्य संगठनों की लगातार मांग रही है कि विज्ञापनों के द्वारा सीधे नियुक्ति हो. ये बिचौलिए और ठेकेदार सफाई कामगारों से तरह-तरह के नाजायज़ टैक्स वसूलते हैं और हर तरह की मांगों को दबाकर प्रशासन से सांठ-गांठ करते रहते हैं.

सफाईकर्मियों के हक़ में आवाज़ उठाने के चलते सामाजिक कार्यकर्ता, कवि अंशु मालवीय को 7 फरवरी को रात में स्पेशल क्राइम ब्रांच द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया. जबकि उससे तीन दिन पहले ही पुलिस ने सफाई कामगारों के नेता दिनेश को गिरफ्तार कर लिया था. हालांकि बाद में गिरफ्तारी के विरोध और जनदबाव के चलते उन्हें देर रात रिहा कर दिया गया.

कुंभ में हो रहा प्रतिबंधित डीडीटी का इस्तेमाल

कुंभ मेले में प्रतिबंधित डीडीटी कीटनाशक का छिड़काव करके लोगों के जीवन से खिलवाड़ किया जा रहा है. इसे लेकर पर्यावरणविदों और मानवाधिकार व सामाजिक कार्यकर्ताओं में मेला प्रशासन के प्रति गहरा रोष है.

अधिवक्ता केके रॉय और चार्ली प्रकाश के मुताबिक पूरे मेला क्षेत्र में छिड़काव के लिए एक लाख किलो डीडीटी की मांग की गई है. बता दें के डीडीटी एक ऐसा जहरीला कीटनाशक है जिसका दुष्प्रभाव बहुत दिनों तक बना रहता है. जाहिर है इससे कल्पवासियों ओर मेला घूमने आनेवालों के स्वास्थ्य पर बुरा असर होगा वहीं मेला की समाप्ति के बाद यहां उगाई जाने वाली सब्जियों के जरिए नागरिकों के स्वास्थ्य पर भी इसका बुरा असर डालेंगी.

डीडीटी का इस्तेमाल पूरी दुनिया में बैन है. भारत में यह 1972 से बैन की गई. सामाजिक कार्यकर्ता दिलीप कुमार गौतम ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका डालकर कुंभ मेले में डीडीटी के इस्तेमाल रोकने और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई करने की मांग की है. इसकी सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने सरकार से जवाब तलब किया है.