पुलवामा हमलाः विदेशी मीडिया में मोदी सरकार की जांच और रणनीति पर उठते सवाल

महेश राठी

कश्मीर पिछले तीन से भी अधिक समय से लगातार आतंकवाद से ग्रस्त और त्रस्त है परंतु पुलवामा हमला इन दशकों में सबसे अधिक घातक और दूरगामी परिणामी पैदा करने वाला आत्मघाती आतंकी हमला था.

इस हमले के बाद जहां भारत में इस हमले को लेकर भारी आक्रोश और नाराजगी का माहौल है और भारतीय मीडिया लगातार इसे लेकर एक उन्माद पैदा करने में लगा है तो वहीं दुनिया के दूसरे देशों की मीडिया भी इस घटना को लेकर अलग तरह के विश्लेषण करते हुए मौजूदा सरकार की कश्मीर रणनीति को सवालों के घेरे में खड़ा करने से लेकर इसमें कश्मीर की धरती पर स्वदेशी आतंक के पनपे का संकेत दे रहा है.

विदेशी मीडिया का यह विश्लेषण और रिपोर्टिंग आने वाले समय में कश्मीर में पैदा होने वाली नई चुनौतियों और खतरों की तरफ भी इशारा कर रहा है.

पुलवामा हमला में सीआरपीएफ के 40 से अधिक जवान शहीद हो गए और इतने ही घायल हुए थे. पाकिस्तान से अपनी गतिविधियां चलाने वाले जैश-ए-मोहम्मद ने इस हमले की जिम्मेदारी ली थी.

इस हमले के बारे में न्यूयार्क टाइम्स की एक रिपोर्ट ने इस हमले के लिए कश्मीर के स्थानीय कारकों को जिम्मेदार माना है और इसी प्रकार की रिपोर्ट ‘वाशिंगटन पोस्ट’ और सिडनी के अखबार ‘द सिडनी मॉर्निेंग हैराल्ड’ ने भी प्रकाशित की और इसे ‘होमग्रोन’ आतंकी हमले की संज्ञा दी है. हालांकि इस बात से भी इंकार नही किया जा सकता है कि इस हमले का रणनीतिकार पाकिस्तान स्थित जैश-ए-मोहम्मद ही है. परंतु इस सच्चाई से भी इंकार नही किया जा सकता है कि इस हमले के लिए इस्तेमाल किया गया आतंकी नौजवान और विस्फोटक सभी स्थानीय स्तर पर हासिल किया गया था.

इस हमले में इस्तेमाल किए गए विस्फोटकों के बारे में रक्षा विशेषज्ञों का दावा है कि जितने विस्फोटक के इस्तेमाल का दावा सरकार और उसकी एजेंसियां इस हमले में कर रही हैं उतनी भारी तादाद में विस्फोटक सीमापार से लाया जाना असंभव है. ध्यान रहे कि सरकार की एजेंसियों ने इस हमले में 750 पाउंड विस्फोटक के इस्तेमाल का दावा किया है.

सेना के पूर्व लफ्टिनेंट जनरल डीएस हुडा के हवाले से अमेरिकी अखबार न्यूयार्क टाइम्स संभावना जताता है कि यह विस्फोटक जम्मू को जाने वाले हाइवे के चैड़ीकरण के लिए पहाड़ी को उड़ाने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे विस्फोटक में से हासिल किया गया हो सकता है.

हालांकि न्यूयार्क टाइम्स ने यह रिपोर्ट 17 फरवरी को प्रकाशित की थी परंतु अब जबकि कांग्रेस भी यह सवाल खड़ा कर रही है कि विस्फोटक कहां से आया और मोदी सरकार जिस प्रकार इस सवाल को नजरंदाज कर रही है उससे न्यूयार्क टाइम्स और जनरल हुडा द्वारा व्यक्त की गई आशंकाओं को बल मिलता है. सरकार ने कई दिनों की जांच के बाद भी कोई सूत्र नहीं मिलने का दावा किया है. अब मोदी सरकार का यह दावा ही उसकी जांच की कलई खोल देता है कि इतनी भारी तादाद में विस्फोटक जमा करके उसका इस्तेमाल किया गया और सरकार को उसके आने का सूत्र पता नहीं चल पाया है.

पुलवामा के सबसे घातक विस्फोट के सूत्र नहीं मिल पाने का यह तिलिस्म यदि किसी ईमानदार जांच से टूटता है तो संभव है कि देशभक्ति के कई दावे अपराधिक घोटालों की चपेट में आ जाएं.

वहीं इस आत्मघाती हमले के हमलावर की पहचान एक स्थानीय नौजवान आदिल अहमद डार के रूप में हुई है और डार का घर हमले की जगह से महज छह किलोमीटर दूर बताया जाता है.

न्यूयार्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट और सिडनी के अखबार द सिडनी मॉर्निेंग हैराल्ड ने अपनी प्रकाशित रिपोर्टो में पुलवामा के हमलावर आदिल डार के पिता गुलाम हसन डार के हवाले से बताया है कि आदिल डार एक हाई स्कूल के बाद पढ़ाई चुका ऐसा नौजवान था जो मजदूरी करके अपना गुजारा करता रहा था परंतु 2016 में वह एक प्रदर्शन के दौरान सीआरपीएफ की गोली से घायल हो गया और उसके बाद पिछले मार्च में ही वह अचानक गायब हो गया और पिछले दिनों किसी पड़ोसी ने उन्हें उनके बेटे की तस्वीर अपने फोन पर दिखाई थी जिसमें वह हाथ में गन लिए और जैश-ए-मोहम्मद का बिल्ला लगाए हुए था. कश्मीर के किसान पिता हसन डार ने कहा कि वह तस्वीर देखकर ही उन्होंने समझ लिया था कि एक दिन उन्हें अपने बेटे के जनाजे को कंधा देना होगा.

आदिल डार

आदिल डार का आतंकवाद की तरफ जाने का और आत्मघाती हमलावर बनने का अकेला उदाहरण नहीं है पिछले तीन सालों में ऐसे नए नौजवानों के आतंकी संगठनों की तरफ आकर्षित होने और आतंकियों की भर्ती में एक भारी उछाल आया है.

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट की माने तो आतंकी भर्ती के इस उछाल के रूझान पर जेएनयू के प्रोफेसर और कई सालों से कश्मीर के घटनाक्रम पर निगाह रख रहे हैप्पीमोन जैकब का कहना है कि 2013 तक जहां मुट्ठीभर नौजवान ही आतंक की राह पर जा रहे थे तो वहीं मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद इस रूझान में तेजी देखी गई है. उनके अनुसार पिछले साल 2018 में ही आतंकी संगठनों में लगभग 150 नौजवान भर्ती हुए हैं.

वहीं कश्मीर के शोपिया से आने वाले एक स्वतंत्र पत्रकार के रूप में काम कर रहे कश्मीरी नौजवान का कहना है कि पिछले तीन सालों में हालात बेहद खराब हुए हैं. उनका कहना था कि एक आतंकी मारा जाता है तो उसकी जगह तीन नए भर्ती होते हैं.

वहीं कश्मीर पर हाल ही में एक किताब लिखने वाले डेविड देवीदास के हवाले से वाशिंगटन पोस्ट की कश्मीर पर एक रिपोर्ट कहती है कि कश्मीर की मौजूदा नई पीढ़ी ने अपने जन्म से ही हिंसा और अस्थिरता देखी है. उनका आगे दावा है कि उनके दिमाग में लगातार यह तस्वीर बनाई गई है कि मुस्लिमों का दुनियाभर में दमन हो रहा है और वह खतरे में हैं और उनके दिमाग में बनाई गई यह तस्वीर उस समय पुष्ट हो जाती है जब वह अपने व्यक्तिगत अनुभव में इसे देखते हैं और तब उसके बाद उनका राजनीतिक और धार्मिक रेडिकलाइजेशन काफी उंचाई पर पहुंच जाता है.

इसके अलावा वाशिंगटन पोस्ट और द सिडनी मॉर्निंग हैराल्ड की एक रिपोर्ट एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के हवाले से कहती है कि आतंकी कमांडर 2016 में बुरहान बानी के मारे जाने के बाद आतंकियों की भर्ती में भारी उछाल आया था. वहीं आतंकवाद पर गहरी समझ रखने वाले कई विशेषज्ञों का कहना है कि बुरहान बानी के मारे जाने के बाद जहां कश्मीरी नौजवानों के आतंकी भर्ती में उछाल आया था तो पुलवामा हमले के बाद उनके हमलों के तरीकों में गुणात्मक परिवर्तन आ सकता है. अभी आतंकवादी अपने हमलों में एक या दो जवानों को ही निशाना बना रहे थे परंतु पुलवामा के बाद उनके हमलों के तरीकों में भी बदलाव आ सकता है.

बुरहान वानी

एक तरफ जहां यह रिपोर्ट पिछले तीन सालों में भर्ती में उछाल की बात कर रही है तो वहीं यह भी कहती हैं कि 2013 से पहले हालात ऐसे नही थे. यदि भारत सरकार के ही आंकड़ों को देखें तो 2012 में आतंकवाद से होने वाली मौतों का आंकड़ा अपने सबसे निचले स्तर पर था.

यह रिपोर्ट आतंकवाद से निपटने की मोदी सरकार की रणनीतियों पर सवाल खड़ा करती हैं. इनके अनुसार मोदी सरकार का कश्मीरी लागों से कोई संपर्क नहीं है और ना ही इनका कोई प्रभाव रखने वाले स्थानीय राजनेताओं से नाता है. पीडीपी से गठजोड़ खत्म होने के बाद पूरा नियंत्रण केन्द्र सरकार के पास आ गया है और उसके बाद से हालात और बिगड़े हैं.

मोदी सरकार की अभी तक की रणनीति और मौजूदा प्रतिक्रिया को देखकर लगता है कि हालत सुधरने वाले नहीं बल्कि और बिगड़ने वाले हैं. इस तथ्य की पुष्टि कश्मीर कमांड के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल कंवलजीत सिंह ढिल्लो की घोषणा भी करती है. वो कहते हैं कि जो बंदूक उठायेगा वह मारा जायेगा. शायद बंदूक से कश्मीर समस्या का हल करने की ठाने सरकार यह भूल जाती है कि वह लगातर बंदूक से ही इस समस्या का हल कर रही है और हालात इतने बेकाबू हो गए हैं कि शायद वह सरकार के नियंत्रण से बाहर होते दिख रहे हैं.

कश्मीर मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि अब आतंक की राह पर चलने वाले नौजवान मदरसों से नही इंजीनियरिंग संस्थानों से आने वाले इंजीनियरिंग छात्र, कॉलेज के स्नातक अथवा अच्छी नौकरी छोड़कर आने वाले नौजवान हैं. मौजूदा मोदी सरकार बंदूक का जवाब बंदूक से देने में विश्वास रखती है और बंदूकों की इस लड़ाई में कश्मीर के नौजवानों के सुनहरे सपने और कश्मीर का भविष्य लगता है कहीं खो गया हैं और आज कश्मीर और उसके नौजवानों का भविष्य मानों एक अंधी दीवार के सामने आकर खड़ा हो गया है.

रिपोर्ट साभार: न्यूज़ प्लेटफॉर्म