सोशल मीडिया मुद्दा: घर में घुसकर मारने की जरूरत नहीं है, अपना घर सुरक्षित कीजिए

संजय कुमार सिंह

सोशल मीडिया पर घूम रहा है। अच्छा होता अगर इसमें कांग्रेस के समय की वारदातें भी शामिल होतीं।

पुलवामा हमला सुरक्षा-व्यवस्था में एक बहुत बड़ी चूक है। क्या आपने सुना इसका पता लगाने की कोई कोशिश हुई, जिम्मेदारी तय करने की बुनियादी जरूरत पूरी की गई और दोषियों का पता लगाने की सामान्य जिज्ञासा भी दिखाई गई। क्या यह जरूरी नहीं है कि इसके लिए जिम्मेदार दोषियों का पता लगाया जाए और उन्हें सजा दी जाए। मुझे ऐसा कुछ नहीं दिखा। हालांकि, यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि जैश ए मोहम्मद के जिम्मेदारी लेने से सरकार ने उसे दोषी मान लिया और पाकिस्तान पर जैश के खिलाफ कार्रवाई के लिए दबाव डालना शुरू हो गया। क्या पाकिस्तान में बैठा जैश हमारे देश में यूं ही इतने बड़े हमले को अंजाम दे सकता है। क्या यहां का कोई इसमें शामिल नहीं होगा? किसी की लापरवाही नहीं होगी। किसी ने अपनी जिम्मेदारी में चूक नहीं की होगी। क्या वे भी दोषी और जिम्मेदार नहीं हैं? अगर मामले की जांच होती तो जैश के खिलाफ भी सबूत मिलते जो पाकिस्तान को देकर उसका मुंह बंद किया जा सकता था पर ऐसा नहीं हुआ। क्यों?

सीआरपीएफ के 44 जवान कैसे मरे की बजाय हम इसमें लगे हैं कि हवाई हमले में उनके कितने मरे। आपको लग सकता है कि सीआरपीएफ के जवान आतंकवादी हमले में मरे। इसमें क्या पता करना है? पर मामला इतना आसान और सीधा नहीं है। जनसत्ता के मेरे मित्र संजय सिन्हा न्यूयॉर्क में ट्विन टावर पर हमले के समय अमेरिका में थे और जनसत्ता के लिए खबरें भेजते थे। उन दिनों हम दोनों के पास फैक्स के साथ हिन्दी का एक ही सॉफ्टवेयर था और हमलोग हिन्दी में फैक्स या ई-मेल कर लेते थे जबकि आमतौर पर हिन्दी में मेल शुरू नहीं हुआ था। संजय की खबरें जनसत्ता में छपने के लिए देने या संपादित करने से पहले उत्सुकतावश मैं उसे पढ़ता जरूर था। मुझे याद है, संजय ने बाद में भी कई बार लिखा कि उस एक घटना के बाद अमेरिका में आतंकवाद की दूसरी वारदात नहीं हुई। अमेरिका में ना तो हमला और ना जवाबी कार्रवाई चुनावी मुद्दा बना था ना यह सवाल उठा कि पाकिस्तान ने बदले में कितने मारे। ना किसी ने इसके लिए सीना ठोंका। यह देश की उपलब्धि रही। देश की पहचान है।

सोशल मीडिया पर आज मुझे साथ में प्रकाशित, “सोचा याद दिला दूं” शीर्षक के तहत आतंकवादी हमलों की यह सूची दिखी तो लगा कि वाकई अपने यहां दाल में कुछ काला है। मैं यह मानने को तैयार हूं कि यह संयोग होगा कि हर हमले के समय केंद्र या संबंधित राज्य में भाजपा की सरकार थी। हालांकि, कांग्रेस सरकार के समय के हमले इसमें नहीं हैं। पर अमेरिका अगर एक हमले के बाद आतंकवाद को काबू कर सकता है तो हमने इतने हमले क्यों होने दिए? कहने की जरूरत नहीं है कि कारण दो ही हो सकता है – या तो रोकने वाल निकम्मे हैं या रोकना नहीं चाहते हैं। कारण चाहे जो हो, यह तो तय है कि रोकना इनके बूते का नहीं है। आप चाहें तो इन्हें एक मौका और दे सकते हैं पर याद रखिए, दूसरी पार्टी के शासन में आतंकवादी वारदात नहीं हुई है ऐसा नहीं है। इसलिए जरूरी है कि आप राजनीति को समझिए। “एंटायर पॉलिटिकल साइंस” जानिए। वरना आतंकवादी हमलों और राष्ट्रवाद के नाम पर आपको बेवकूफ बनाया जाता रहेगा।

सुकमा में नक्सलियों के हाथों सीआरपीएफ के 25 जवानों के मारे जाने के बाद नक्सलियों के खिलाफ वैसा अभियान नहीं चला जैसा 44 जवानों की मौत के बाद जैश के खिलाफ चलाया जा रहा है। क्या आपको इसमें राजनीति छोड़कर कोई और कारण नजर आता है? मेरा मानना है कि तभी सख्ती की गई होती, हमले के कारणों को पता लगाया गया होता जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान की गई होती तो शायद पुलवामा नहीं होता। पर सुकमा तो पुलवामा के मुकाबले कम महत्व दिया गया। यह कहने की जरूरत नहीं है। बिल्कुल स्पष्ट है। नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई तो भारत सरकार को करनी थी। किसी अंतरराष्ट्रीय दवाब या कूटनीति की जरूरत नहीं थी – पर तब नेता उतने सक्रिय नहीं हुए। तब नक्सलियों के खिलाफ वैसा अभियान नहीं चला (नागरिकों द्वारा) जैसा कश्मीरियों के खिलाफ चला। मुझे लगता है कि आतंकवाद और जवानों की मौत में राजनीति ज्यादा है और हमलोग समझते नहीं है इसीलिए पाकिस्तान की सक्रियता का असर देश में हो पाता है। रोकना तो सरकार को ही है इसके लिए घर में घुसकर मारने की जरूरत नहीं है। अपना घर सुरक्षित कीजिए। विंग कमांडर अभिनंदन के लिए तो देश ठहर गया था। आप वहां फंस गए होते तो…

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का पुराना भाषण सुनिए। वे मनमोहन सिंह से पूछते थे कि पाकिस्तानी आतंकवादी सीमा पार करके कैसे आ जाते हैं? अब सेना और सैनिकों की जान जोखिम में डाल रहे हैं। जब कहते हैं कि सेना को जवाबी कार्रवाई की खुली छूट है तो घुसपैठियों को रोकने की खुली छूट क्यों नहीं दे रहे हैं। और जब उन्होंने कहा नहीं है तो मैं क्यों मानूं कि छूट है। जाहिर है, घुसपैठ रोकने की दिशा में कारगर काम नहीं होता है। देश में कुछ लोगों के संबंध और संपर्क पाकिस्तान में बैठे आकाओं से है जो यहां आतंकवादी कार्रवाई को अंजाम देते हैं। चूंकि कार्रवाई की छूट सरकार देती है इसलिए कार्रवाई नहीं हो रही है इसका मतलब यही है कि उन्हें छूट नहीं है। कारण चाहे जो हो, ऐसा नहीं है कि मोदी जी को पता नहीं है कि क्या करने की जरूरत है। वे जब विपक्ष में थे तभी से सब जानते हैं। यह भी कि कांग्रेस को कैसे बदनाम करना है और अपनी ब्रांडिंग कैसे करनी है। इस सूची में कांग्रेस के समय की कितनी आतंकवादी वारदातें छूटी हैं। पर भाजपा इनकी बात नहीं कर 1984 के दंगों की बात करती है। यही है 56 ईंची राजनीति।

अब पुलवामा पर आता हूं। हमले के संबंध में कई सवाल उठे सरकार ने किसी का जवाब नहीं दिया उल्टे वायु हमले में वहां कितने मरे – का विवाद शुरू कर दिया। इसमें कोई दो राय नहीं है कि हमला जरूरी और जायज था। उसपर कोई सवाल नहीं था पर सूत्रों के हवाले से अखबारों में मरने वालों की संख्या बताकर जानबूझकर विवाद पैदा किया गया है ताकि मुद्दे रह जाएं और वही हुआ है। आपको याद होगा पुलवामा हमले के दिन एसयूवी में 350 किलो विस्फोटक होने की खबर छपवाई गई थी। 350 किलो विस्फोटक के साथ एसयूवी का सीआरपीएफ के काफिले के लिए सुरक्षित किए गए रास्ते में पहुंच जाना असाधारण है। कश्मीर में राष्ट्रपति शासन है। इसके लिए कौन जिम्मेदार है? जिम्मेदार के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई, गोदी मीडिया की सहायता से विस्फोटक की मात्रा कम होती गई। एसयूवी तो बदल ही गया। पहले तो हमला और उसके बाद मीडिया को ब्रीफिंग – दोनों ही गंभीर चूक हैं। पर कार्रवाई का पता नहीं। श्रद्धा और आस्था में दोष नहीं दिखता है पर सच यही है कि पूरी व्यवस्था चला रहे लोग बहुत ही अनाड़ी है।

साभार: वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह की रिपोर्ट। वाया भड़ास4मीडिया