अख़बार नामा: जूताकांड बीजेपी का है, इसलिए गोदी मीडिया उदासीन है!

गिरीश मालवीय / संजय कुमार सिंह

Girish Malviya : कल बीजेपी सांसद ने बीजेपी के ही विधायक को मीटिंग में सरेआम जूते मारे. वीडियो भी उपलब्ध है लेकिन आज न्यूज़ चैनलों ओर प्रिंट मीडिया में इस बात की बड़ी ढकी छुपी रिपोर्टिंग है.

लेकिन यही काम यदि आप पार्टी के सांसद ने आप के विधायक के साथ किया होता तो आप खुद ही सोचिए कि क्या होता? न्यूज़ चैनलों के स्टूडियो में अब तक भूचाल आ जाता. बाकायदा पैनल्स बुला बुलाकर ‘आप’ वालो का ‘राशनकार्ड’ बनवा दिया जाता.

एक पैनलिस्ट बकायदा एंकर के ऊपर जूते बरसा कर यह बताता कि देखिए जूते बरसाने की गति 4 सेकंड में 7 जूते की है यह किसी जनप्रतिनिधि पर जूते बरसाने की सबसे तेज गति है इसे हम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल करवाने का पूरा प्रयास कर रहे हैं!

एंकर भी जूते खाने के बाद मंद मंद मुस्काता और बोलता….. थोड़ी ही देर में हम आपको बताएंगे कि पहले जूता किसने निकाला? लेकिन अभी एक ब्रेक ले लेते है ……. देखते रहिए आज तक…

Sanjay Kumar Singh : जूता स्ट्राइक की खबर हिन्दुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर फोटो के साथ नहीं है पर इंडियन एक्सप्रेस में खबरों के पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम में ही सही, फोटो के साथ है। पहले पन्ने पर बड़े विज्ञापन के बावजूद।

इंडियन एक्सप्रेस में जूता स्ट्राइक की खबर पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम में है। अखबार अगर न्यूजफोटो से बलात्कार करें तो यही होगा। मेरे ख्याल से सांसद विधायक को सरकारी मीटिंग में सरेआम जूता मारे – इसमें यह बताने की जरूरत नहीं है कि किसलिए मारा। तस्वीर ही दुर्लभ है और वही खबर है। कैप्शन काफी था। डबल कॉलम तो होना ही चाहिए था। बाकी अंग्रेजी के एलीट जूते -वूते की खबर पहले पेज पर छापते तो पन्ना गंदा हो जाता। हिन्दी वालों की भक्ति के क्या कहने। नवोदय टाइम्स ने खबर तो बड़ी छापी है पर फोटो का वही किया है। अमर उजाला अपवाद रहा।

द टेलीग्राफ में – राफेल की नंगी धमकी और जूता स्ट्राइक की खबर साथ-साथ। टेलीग्राफ ने लिखा है कि सरकार ने हिन्दू में प्रकाशित रफाल सौदे से संबंधित खबरों को “चोरी का” कहा है और अखबार के खिलाफ कार्रवाई की धमकी दी है। इसपर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा कि क्या वह शासकीय गुप्त बात अधिनियम या “राष्ट्रीय सुरक्षा” की आड़ में “शरण ले सकती है”। यही नहीं अखबार ने लिखा है कि रफाल मामलों को स्वीकार न कर आरोप लगाकर ही सरकार ने सेल्फ गोल कर लिया है। पहला तो यही कि प्रधानमंत्री के कार्यालय के करीब रक्षा मंत्रालय से सबसे सुरक्षित फाइल चुराई जा सकती है?

जब सरकार सुप्रीम कोर्ट में यह दावा कर रही थी तभी कुछ चैनल दिखा रहे थे कि उनके पास वायु सेना की गुप्त फाइल है जिसमें पाकिस्तान पर किए गए वायु हमले के सबूत हैं। क्या सरकार इन तस्वीरों को भी “चोरी का माल” मानेगी?

क्या सरकार इन तस्वीरों को लीक करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करेगी?

क्या उन दस्तावेजों को “चोरी का माल” कहा जाएगा जिसके आधार पर गोदी मीडिया ने सरकार का बचाव किया था (कहा गया था कि पूरा नोट या पन्ना क्यों नहीं छापा)। क्या उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी जो सरकार के अनुकूल दस्तावेज लीक करते रहे हैं।

साभार : मीडिया विश्लेषक गिरीश मालवीय और संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से। वाया- भड़ास4मीडिया