राफेल पुनर्विचार केस: “जब भ्रष्टाचार के आरोप हों तो क्या सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा की शरण ले सकती है ? “: SC ने केंद्र से पूछे तीखे सवाल

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने राफेल मामले में अटार्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल की दलीलों पर बड़े सवाल उठाए जिसमें उनके द्वारा कहा गया कि अदालत सबूत के तौर पर चुराए गए दस्तावेजों पर भरोसा नहीं कर सकती है।

दरअसल AG ने यह तर्क दिया था कि दाखिल की गयी पुनर्विचार याचिका अखबारों द्वारा प्रकाशित उन दस्तावेजों पर आधारित थी, जो रक्षा मंत्रालय से प्राधिकरण के बिना चुराए गए थे। दस्तावेजों को ‘विशेषाधिकार’ (privilege) प्राप्त है और ये दस्तावेज ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट के उल्लंघन में प्राप्त किए गए थे। इसलिए इन दस्तावेजों का हवाला देते हुए याचिकाओं को रद्द किया जाना चाहिए।

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए न्यायमूर्ति के. एम. जोसेफ ने कहा कि चोरी के दस्तावेजों को भी न्यायालय द्वारा साक्ष्य अधिनियम के तहत अच्छी तरह से प्रतिपादित सिद्धांतों के अनुसार देखा जा सकता है। हालांकि AG ने कहा कि दस्तावेजों के स्रोत को प्रकट करना महत्वपूर्ण है।

इस बिंदु पर CJI ने पूछा, “यदि कोई अभियुक्त चोरी के दस्तावेज के आधार पर अपनी दलील स्थापित करता है तो क्या अदालत को उसे अनदेखा करना चाहिए?” हालांकि AG अपने रुख पर अड़े रहे और न्यायमूर्ति पसायत के 2004 के निर्णय के हवाले से कहा कि अवैध रूप से प्राप्त सबूतों को छोड़ दिया जाना चाहिए।

प्रतिक्रिया में पीठ ने कहा कि ऐसे भी फैसलें हैं जो यह मानते हैं कि अवैध रूप से हासिल किए गए साक्ष्यों पर अदालतें निर्भर रह सकती हैं।

CJI ने यह टिप्पणी भी की कि यदि किसी व्यक्ति ने आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम के तहत अपराध किया है तो उसके खिलाफ कार्यवाही की जा सकती है; लेकिन वह दस्तावेज़ के प्रभाव को कम नहीं करेगा।

तब AG ने राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में राफेल विमानों की खरीद के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह सौदा देश को दुश्मनों से बचाने के लिए जरूरी है जिसमें लड़ाकू विमानों की नवीनतम पीढ़ी का अधिग्रहण किया गया है। “यह खरीद दुश्मनों के खिलाफ इस राष्ट्र के अस्तित्व को बचाये रखने के लिए आवश्यक है,” उन्होंने कहा।

LIVE LAW HINDI की रिपोर्ट के मुताबिक इस पर जस्टिस जोसेफ ने टिप्पणी की, “जब भ्रष्टाचार के आरोप हों तो क्या सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा के तहत शरण ले सकती है?” इस पर AG ने कहा कि इस मामले में एक राजनीतिक कोण भी मौजूद है और इससे निपटने के लिए अदालत उपयुक्त मंच नहीं है। राफेल को लेकर कैग की रिपोर्ट संसद में पहले से ही मौजूद है और वो इस पर गौर करेगी।

“राफेल से जुड़ा कुछ भी विपक्ष द्वारा सरकार को अस्थिर करने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा,” AG ने अदालत को मामले के संभावित राजनीतिक प्रभाव के बारे में बताया।

तब कोर्ट ने पुनर्विचार याचिकाकर्ताओं में से एक प्रशांत भूषण से पूछा तो उन्होंने AG की इन दलीलों का विरोध किया कि किसी दस्तावेज को तब तक साक्ष्य में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता जब तक कि उसका स्रोत सामने न आए। उन्होंने कहा कि 2G और कोयला घोटाला मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे दस्तावेजों पर जांच के आदेश देने के लिए भरोसा किया था। हालांकि इस तरह के दस्तावेज उचित चैनल के माध्यम से तैयार नहीं किए गए थे।

भूषण ने कहा कि ये तर्क अदालत द्वारा तब खारिज कर दिए गए थे। उन्होंने कहा कि रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार के आरोप कानून के तहत किसी प्रकार की विशेष छूट प्राप्त नहीं करते हैं। उन्होंने कहा कि याचिकाओं में उल्लेख किया गया है कि दस्तावेजों को द हिंदू और द कारवां द्वारा प्रकाशित किया गया था।

लंच से पहले के सत्र में भूषण ने यह दलील दी थी कि अदालत इस बात की सराहना करने में विफल रही कि याचिका में इस सौदे को रद्द करने की कोशिश नहीं की गई बल्कि इससे जुड़े भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट का निर्णय सरकार द्वारा प्रस्तुत गलत और भ्रामक तथ्यों पर आधारित था। वहीं AG का कहना था कि रक्षा सौदे से जुड़े दस्तावेज गोपनीय हैं जो रक्षा मंत्रालय से चुराए गए हैं। इस पर कार्रवाई करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। इसके बाद अदालत ने मामले के एक अन्य याचिकाकर्ता अरुण शौरी को दलीलें देने को कहा और मामले की सुनवाई को 14 मार्च तक के लिए टाल दिया।

इससे पहले 26 फरवरी को राफेल मामले में दाखिल पुनर्विचार व अन्य याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई को तैयार हो गया था और कहा था कि ये सुनवाई खुली अदालत में होगी।

दरअसल केंद्र ने शीर्ष अदालत के 14 दिसंबर के फैसले को संशोधित करने के लिए दिसंबर, 2018 में ही आवेदन दायर किया। तत्पश्चात जनवरी में वकील प्रशांत भूषण, अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा और आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह के साथ- साथ वकील एम. एल. शर्मा ने पुनर्विचार याचिकाएं दायर कीं।

केंद्र ने अपने आवेदन में कहा है कि 36 राफेल जेट के सौदे के मूल्य निर्धारण के बारे में अंग्रेजी व्याकरण में “गलत तरीके से दी गई” जानकारी को ‘सील कवर नोट’ में प्रस्तुत किया गया। भूषण और अन्य लोगों ने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला दोषपूर्ण है। वे चाहते हैं कि शीर्ष अदालत अपने “गलत” फैसले पर फिर से विचार करे, जो राफेल सौदे को बरकरार रखने के लिए “गैर-मौजूद” सीएजी रिपोर्ट पर निर्भर करता है।

उन्होंने कहा है कि काल्पनिक सीएजी रिपोर्ट पर आधारित अदालत का यह फैसला केवल “लिपिक या अंकगणित” भूल नहीं बल्कि यह एक बड़ी त्रुटि है। इसलिए फैसले को वापस लिया जाए।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि सीएजी एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय है जो केवल संसद के प्रति जवाबदेह है। सरकार का दावा है कि राफेल पर सीएजी की अंतिम रिपोर्ट एक नए रूप में होगी जो असत्य है। वास्तव में सरकार सीएजी को ऐसा कोई निर्देश नहीं दे सकती कि क्या किया जाना चाहिए और क्या नहीं।