मुझे मां गंगा ने बुलाया है कहने वाले पीएम मोदी की गंगा सफाई के लिए बनी समिति, पर नहीं हुई है एक भी बैठक

गंगा की सफाई को लेकर सरकार किस कदर गंभीर है, यह एक आरटीआई के खुलासे से उजागर हो जाता है। ‘द वायर’ को मिले आरटीआई के मुताबिक गंगा की सफाई के लिए पीएम की अध्यक्षता में बनी एनजीसी की आज तक एक भी बैठक नहीं हुई। जबकि, गंगा की सफाई से लकर प्रबंधन की निगरानी यही समिति करती है। जनसत्ता ऑनलाइन के अनुसार गंगा की सफाई के लिए गठित पीएम के नेतृत्व वाली समिति ने आज तक एक भी बैठक नहीं की।

केंद्र की सत्ता में मोदी सरकार के आते ही पहले गंगा की सफाई को लेकर खूब चर्चाएं हुईं। नमामि गंगे नाम से परियोजना का शुभारंभ भी हो गया। लेकिन, साढ़े चार साल से ऊपर का समय बीत गया, गंगा की हालत जस की तस है। नदी को साफ करने के लिए 2014 से 2018 के बीच 3,867 करोड़ रुपये खर्च भी कर दिए गए। लेकिन, गंगा मैली ही रही। वहीं इस बीच ‘द वायर’ के हवाले से एक और चौंकाने वाली खबर सामने आई है। द वायर ने सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत मिली जानकारी के हवाले से बताया है कि गंगा की सफाई के लिए बनी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली ‘राष्ट्रीय गंगा परिषद’ (एनजीसी) की आज तक एक भी बैठक नहीं हुई। जबकि, यह जरूरी है कि साल में कम से कम एक बार इस समिति की बैठक पीएम की अध्यक्षता में संपन्न हो।

कई मंचों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद गंगा सफाई को लेकर अपनी चिंता जाहिर करते रहे हैं। लेकिन, उनके नेतृत्व वाली समिति की बैठक का मुकम्मल नहीं होना चौंकाने वाला पक्ष है। गौरतलब है कि गंगा नदी के संरक्षण और प्रबंधन के लिए अक्टूबर 2016 में ‘राष्ट्रीय गंगा परिषद’ (एनजीसी) का गठन किया गया था। इस दौरान गंगा संरक्षण मंत्रालय की ओर से एक अधिसूचना भी जारी की गई और कहा गया कि एनजीसी साल में कम से कम एक या इससे अधिक बार बैठकें कर सकती है। लेकिन, द वायर के मुताबिक समिति के दो साल होने के बावजूद अभी तक एक भी बैठक मुमकिन नहीं हो पाई है। उल्लेखनीय है कि गंगा सफाई और इसके प्रबंधन को लेकर एनजीसी सबसे बड़ी समिति है। दरअसल, एनजीसी को अक्टूबर 2016 से पहले राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण (एनजीआरबीए) के नाम से जाना जाता था। लेकिन, मोदी सरकार ने इसका विघटन कर दिया। लेकिन, तब भी आनजीआरबीए की कार्यप्रणाली एनजीसी की तरह ही थी। इसके अध्यक्ष भी प्रधानमंत्री ही हुआ करते थे।

एनजीआरबीए का गठन 2009 में यूपीए के सत्ता में दोबारा आने के बाद किया गया था। इसकी पहली बैठक मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में 5 अक्टूबर 2009 को हुई थी। इसके बाद तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में 2009 से 2012 तक तीन बैठकें हुईं। 2014 में मोदी सरकार के आने के बाद 2016 तक भी तीन बैठके हुईं जिनमें दो गंगा संरक्ष मंत्री उमा भारती और एक बैठक पीएम मोदी ने की थी।

पैसे झोंके, लेकिन गंगा साफ नहीं हुई:

गंगा के घटते जल-स्तर और शहरों के नालों का गिरता पानी तथा नदी के भीतर गाद जमा होने जैसे संकट अभी तक बने हुए हैं। जबकि, केंद्र सरकार की तरफ से हजारों करोड़ रुपये सफाई के लिए झोंके जा चुके हैं। द वायर को आरटीआई से मिली एक दूसरी जानकारी के मुताबिक गंगा के लिए 2014 से 2018 तक जारी 5,523 करोड़ रुपये में से 3,867 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। लेकिन, गंगा मैली की मैली ही है। नदीं में बीओडी (बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड) की मात्रा काफी अधिक बनी हुई है। अधिकांश जगहों पर डीओ (डिजॉल्व ऑक्सीजन) की मात्रा घटती जा रही है। एक अन्य रिपोर्ट में यह बात सामने आई थी कि गंगा नदी में बीओडी की मात्रा बढ़ने से इसका पानी नहाने लायक तक नहीं है। गौरतलब है कि बीओडी पानी में प्रदूषण के स्तर को दर्शाता है। जबकि डीओ पानी में ऑक्सीजन की मात्रा यानी स्वच्छता को दर्शाता है। अगर डीओ है तो नदी के भीतर रहने वाले जंतु भी सुरक्षित रह सकते हैं। लेकिन अगर बीओडी की मात्रा बढ़ती है तो उनके भीतर रहने वाले जंतुओं के जीवन पर भी खतरा मंडराने लगता है।

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक गंगा के किनारे बसे 97 में से 66 शहरों के नाले का पानी सीधे गंगा में जाकर गिरता है। पश्चिम बंगाल के तकरीबन 78 फीसदी नाले सीधे गंगा नदीं में बिना शोधन किए ही गिरते हैं। गंगा के किनारे बसे राज्यों उत्तराखंड, यूपी, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के शहर प्रदूषण के बड़े कारण हैं। इनमें पश्चिम बंगाल का अनुपात सबसे ज्यादा है।

कैग से मिल चुकी है फटकार:

दिसंबर 2017 में नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) ने गंगा की सफाई में हुई कोताही के लिए सरकार को कड़ी फटकार लगाई थी। राष्ट्रीय स्वच्छता गंगा मिशन पर कैग ने अपनी एक ऑडिट रिपोर्ट सौंपी थी। रिपोर्ट में नदी की सफाई, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों की स्थापना और घरों में शौचालयों के निर्माण में संबंधित देरी की तरफ ध्यान दिलाया था। बीजेपी के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी की प्राक्कलन समिति ने गंगा सरक्षण के मसले पर अपनी रिपोर्ट में सरकार की तरफ से किए जा रहे प्रयास पर काफी निराशा जाहिर की थी। प्राक्कलन समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था, “सिर्फ गंगा की मुख्य धारा ही नहीं बल्कि 11 राज्यों से होकर गुजरने वाले पूरे गंगा बेसिन में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता की भारी कमी है। गंगा में पांच राज्यों उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में रोजाना 730.01 करोड़ लीटर सीवजे तैयार होता है, लेकिन सिर्फ 212.6 करोड़ लीटर सीवेज ही साफ हो पाता है।

गंगा से जुड़े विशेषज्ञों की अनदेखी:

पानी के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए विख्यात सामाजिक कार्यकर्ता राजेंद्र सिंह भी वर्तमान सरकार के रुख पर निराशा जाहिर कर चुके हैं। राजेंद्र सिंह ने विभिन्न मीडिया संस्थाओं को दिए साक्षात्कार में यह स्पष्ट किया कि सरकार की तरफ से गंगा की सफाई को लेकर कोई सही दिशा में काम नहीं चल रहा है। उन्होंने कहा था, “गंगा नदीं को दिल की बीमारी है लेकिन दांत का डॉक्टर उसका इलाज कर रहा है।” राजेंद्र सिंह के मुताबिक सरकार ने बांध बनाकर गंगा की अविरल धारा को रोकने का काम किया है। गंगा के लिए पैसे तो दिए जा रहे हैं, लेकिन सही जगह खर्च नहीं किया जा रहा।

गौरतलब है कि सरकार ने गंगा की सफाई के लिए नमामि गंगे परियोजना की शुरुआत की थी। इसके योजना के तहत गंगा की सफाई के लिए निश्चित मापदंड तैयार हुए। जिनमें गंगा नदी के किनारे बसे सभी शहरों के सीवेज का ट्रीटमेंट, औद्योगिक प्रदूषण का उपचार, नदी में बैठे गाद की सफाई, गांवों में स्वच्छता, घाटों और श्मशान घाट का निर्माण, रिवरफ्रंट का निर्माण, पेड़ों को लगाना आदि शामिल है।