मोदी सरकार में दर्ज हुई ग्रामीण मजदूरों की वास्तविक आय में भयानक गिरावट

न्यूज़ प्लेटफार्म के लिए रामू सिद्धार्थ की रिपोर्ट के मुताबिक 2014 के लोकसभा चुनावों का सबसे लोकप्रिय नारा ‘अच्छे दिन’ था. मतदाताओं के एक बड़े हिस्से ने अच्छे दिनों की उम्मीद में मोदी जी को वोट दिया. ऐसे मतदाताओं में करीब 33 करोड़ ग्रामीण मजदूर भी थे. जिसमें करीब 25 करोड़ खेतिहर मजदूर थे. उन्हें लगा कि उनके और अच्छे दिन आ सकते हैं. उन्हें एक सम्मानजनक, गरिमामयी और आर्थिक तौर पर और भी बेहतर तथा सुरक्षित जिंदगी जीने को मिल सकती है. लेकिन, हुआ इसके उलटा.

मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए-2 सरकार में ग्रामीण मजदूरों की वास्तविक मजदूरी में वृद्धि दर 6.7 प्रतिशत थी. जो कि मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के पांच वर्षों के शासनकाल में गिरकर 0.5 प्रतिशत हो गई है यानी करीब 6.2 प्रतिशत की गिरावट.

मोदी सरकार के पांच वर्षों में ग्रामीण मजदूरों की मजदूरी में वृद्धि की कुल औसत वृद्धि दर 4.7 प्रतिशत रही. इस दौरान मुद्रास्फृति की औसत दर 4.2 प्रतिशत रही.

हम जानते हैं कि वास्तविक मजदूरी की दर में वृद्धि कुल मजदूरी की दर में वृद्धि में से मुद्रा स्फृति की वृद्धि की दर निकालने के बाद होती है. जब हम मजदूरी की दर में वृद्धि की औसत दर 4.7 प्रतिशत में मुद्रास्फीति की औसत वृद्धि दर 4.2 प्रतिशत घटाते हैं, तो पाते हैं कि एनडीए के शासनकाल में ग्रामीण क्षेत्रों के मजदूरों की मजदूरी में वास्तविक वृद्धि दर सिर्फ 0.5 यानी आधा प्रतिशत रही.

जब हम इसकी तुलना यूपीए-2 से करते हैं, तो पाते हैं कि वास्तविक मजदूरी की दर में भयानक गिरावट आई है.
यूपीए-2 के शासनकाल में ग्रामीण क्षेत्र की मजदूरी में कुल वृद्धि की दर 17.8 प्रतिशत थी. जबकि, इस दौरान मुद्रास्फीति की दर 11.1 प्रतिशत थी. कुल मजदूरी की वृद्धि दर 17.8 प्रतिशत में से मुद्रास्फीति की दर 11.1 प्रतिशत घटाने पर भी वास्तविक मजदूरी की दर में वृद्धि 6.7 प्रतिशत थी. कहां यूपीए-2 के शासनकाल की 6.7 प्रतिशत की वृद्धि और कहां मोदी जी के नेतृत्व वाले एनडीए के शासन काल में सिर्फ 0.5 प्रतिशत की वृद्धि.

कोई भी कल्पना कर सकता है कि वास्तविक मजदूरी में करीब पांच सालों में इतनी बड़ी गिरावट का क्या असर करीब 33 करोड़ मजदूरों पर पड़ा होगा. ग्रामीण मजदूरों को किन हालातों में जीना पड़ रहा है. इसका अंदाजा लगाया जा सकता है.

मोदी सरकार यह दावा कर रही है कि उसने मुद्रास्फीति पर नियंत्रण लगाया है. उसका कहना है कि एनडीए सरकार में यूपीए-2 की तुलना में मुद्रास्फीति की दर कम रही है. यह सच भी है. लेकिन, दुनिया भर में यह स्थापित सिद्धांत है कि यदि देश की बहुसंख्यक आबादी की वास्तविक आय में वृद्धि की दर धीमी है, तो मुद्रास्फीति अपने आप कम रहेगी; क्योंकि बहुसंख्यक लोगों के हाथ में खरीदने के लिए पैसा कम हाथ में आ रहा है.

इस तथ्य को यूपीए-2 और एनडीए सरकार की मुद्रास्फीति की तुलना से समझा जा सकता है. भले ही यूपीए-2 के शासनकाल में मुद्रास्फीति की वृद्धि दर 11.1 प्रतिशत थी, लेकिन उसके साथ ही ग्रामीण मजदूरों की मजदूरी में वृद्धि की दर 17.8 प्रतिशत थी.

इसका मतलब यह है कि उनके हाथ में पैसा आ रहा था. वे खरीदारी कर रहे थे. उनकी खरीदारी से चीजों के दाम बढ़ रहे थे. यहां एक तथ्य की ओर और भी ध्यान देना भी जरूरी है. पिछले पांच वर्षों में मुद्रास्फीति में सबसे कम वृद्धि कृषि उत्पादों के दामों में हुई है. कम मुद्रास्फीति की मार सबसे ज्यादा किसानों पर पड़ी है. पिछले 14 वर्षों में उनकी आय में सबसे कम वृद्धि हुई है. उनकी आय घटकर एक-तिहाई हो गई है.

ग्रामीण मजदूरों की हालात पिछले वर्षों कितनी बदतर हुई है? इसका अंदाजा ग्रामीण मजदूरों की आत्महत्या की बढ़ती दर से लगाया जा सकता है.

नेशनल क्राइम ब्यूरो के आकंड़े बता रहे हैं कि पिछले वर्षों में किसानों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्र के मजदूरों में आत्महत्या की दर तेजी से बढ़ी है. लोकसभा में सरकार द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार 2014 से 2016 के बीच कृषि से जुड़े कुल 36,332 लोगों ने आत्महत्या की. इसमें 16,324 लोग यानी 45 प्रतिशत कृषि-मजदूर थे.

भारत में कुल श्रमशक्ति का 46.6 प्रतिशत लोग खेतिहर मजदूर हैं. इनकी संख्या करीब 25 करोड़ 40 लाख है. खेतिहर मजदूरों के अलावा अन्य ग्रामीण श्रमिक हैं. कुल मिलाकर ग्रामीण श्रमिकों की संख्या करीब 33 करोड़ से अधिक है.

इन 33 करोड़ ग्रामीण लोगों की आय में मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के शासनकाल के दौरान औसत तौर पर सिर्फ 0.5 प्रतिशत की वास्तविक वृद्धि हुई. जबकि, इसके पहले की यूपीए-2 की सरकार में यह वास्तविक वृद्धि 6.7 प्रतिशत थी. जो कि जमीन-आसमान का अंतर है.

सच यह है कि अच्छे दिनों के आने की कौन कहे, इन पाँच वर्षों में किसानों के साथ ग्रामीण मजदूरों की भी हालात बद से बदतर हुई है. आंकड़ों के साथ इस सच्चाई को वास्तविक जिंदगी में भी देखा जा सकता है.

साभार: डॉक्टर रामू सिद्धार्थ फारवर्ड प्रेस (हिंदी) के संपादक हैं.