ज़रा याद करो कुर्बानी: फांसी से पहले भगत सिंह का संदेश, पढिये…

23 मार्च 1931 को ब्रिटिश सत्ता ने भगत सिंह और उनके साथियों राजगुरु और सुखदेव को फांसी पर चढ़ा दिया था. तब से लेकर आज तक भगत सिंह और उनके साथी युवाओं समेत पूरे देश के प्रेरणास्त्रोत रहे हैं.

भगत सिंह ने तीन मार्च 1931 को लाहौर जेल से अपने छोटे भाई अजीत कुलतार को लिखा था,

“हवा में रहेगी मेरे ख्याल की बिजली,
ये मुश्ते-ख़ाक है फानी, रहे रहे न रहे।”

और यह सही साबित हुआ. आज भी उनके विचारों की बिजली हवा में तैर रही है. आइए पढ़ते हैं भगत सिंह के दो पत्र, जो उन्होंने फांसी से पहले अपने साथियों और छोटे भाई को लिखे थे.

साथियों के नाम पत्र

22 मार्च, 1931

साथियों,
स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं चाहता. लेकिन एक शर्त
पर जिंदा रह सकता हूं कि मैं कैद होकर या पाबन्द होकर जीना नहीं चाहता. मेरा नाम हिन्दुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है और क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊंचा उठा दिया है- इतना ऊंचा कि जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊंचा मैं हर्गिज नहीं हो सकता.

आज मेरी कमजोरियां जनता के सामने नहीं हैं. अगर मैं फांसी से बच गया तो वे जाहिर हो जाएंगी और
क्रांति का प्रतीक चिन्ह मद्धिम पड़ जाएगा या संभवतः मिट ही जाए. लेकिन दिलेराना ढंग से हंसते-हंसते
मेरे फांसी चढ़ने की सूरत में हिन्दुस्तानी माताएं अपने बच्चों के भगतसिंह बनने की आरजू किया करेंगी
और देश की आजादी के लिए कुर्बानी देने वालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना
साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी.

हाँ, एक विचार आज भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे
दिल में थीं, उनका हजारवाँ भाग भी पूरा नहीं कर सका. अगर स्वतन्त्र, जिंदा रह सकता तब शायद उन्हें
पूरा करने का अवसर मिलता और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता. इसके सिवाय मेरे मन में कभी कोई लालच फांसी से बचे रहने का नहीं आया. मुझसे अधिक भाग्यशाली कौन होगा? आजकल मुझे स्वयं पर बहुत गर्व है. अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इन्तजार है. कामना है कि यह और नजदीक हो जाए.

आपका साथी – भगतसिंह

छोटे भाई कुलतार के नाम अन्तिम पत्र

सेंट्रल जेल, लाहौर,
3 मार्च, 1931

अजीज कुलतार,

आज तुम्हारी आंखों में आंसू देखकर बहुत दुख हुआ. आज तुम्हारी बातों में बहुत दर्द था, तुम्हारे आंसू
मुझसे सहन नहीं होते. बरखुर्दार, हिम्मत से शिक्षा प्राप्त करना और सेहत का ख्याल रखना. हौसला रखना और क्या कहूँ!

उसे यह फ़िक्र है हरदम नया तर्ज़े-ज़फा क्या है,
हमे यह शौक़ है देखें सितम की इन्तहा क्या है
दहर से क्यों खफ़ा रहें, चर्ख़ का क्यों गिला करें,
सारा जहां अदू सही, आओ मुकाबला करें
कोई दम का मेहमां हूं ऐ अहले-महफ़िल,
चराग़े-सहर हूं बुझा चाहता हूँ।
हवा में रहेगी मेरे ख्याल की बिजली,
ये मुश्ते-ख़ाक है फानी, रहे रहे न रहे

अच्छा रुख़सत. खुश रहो अहले-वतन; हम तो सफ़र करते हैं. हिम्मत से रहना. नमस्ते.

तुम्हारा भाई,
भगतसिंह