लोकसभा चुनाव 2019: सुप्रीम कोर्ट ने EVM से VVPAT पर्ची मिलान को बढ़ाने की वकालत की, चुनाव आयोग से मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को चुनाव आयोग को 28 मार्च तक हलफनामा दाखिल कर बताने को कहा है कि क्या वो लोकसभा चुनावों में EVM से मतदाता सत्यापित पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) की औचक गिनती को बढ़ा सकता है या नहीं।

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस दीपक गुप्ता की पीठ ने कहा कि वो चाहते हैं कि एक विधानसभा क्षेत्र में एक बूथ में होने वाले औचक निरीक्षण के फैसले को चुनाव आयोग बदले और इसे और बढ़ाए। पीठ ने कहा है कि चुनाव आयोग ये भी बताए कि इसे बढ़ाने में आयोग को दिक्कत क्या है।

चीफ जस्टिस ने कहा, “यहां कोई किसी पर आरोप नहीं लगा रहा है, ये मामला संतुष्टि का है।” वहीं चुनाव आयोग की ओर से पेश अधिकारी ने कहा कि आयोग इसे लेकर पूरी तरह आश्वस्त है और अभी तक की प्रणाली पूरी तरह दुरुस्त है। लेकिन चीफ जस्टिस ने कहा कि वीवीपीएटी लागू करने के लिए भी सुप्रीम कोर्ट ने ही आदेश जारी किया था तब भी आयोग की तरफ से विरोध का सामना करना पड़ा था।

लिहाजा आयोग खुद फैसला कर पीठ को बताए। पीठ ने इस मामले की सुनवाई 1 अप्रैल को निर्धारित की है। 15 मार्च को लोकसभा चुनाव के मद्देनजर 21 विपक्षी पार्टियों के नेताओं की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था।

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ ने कहा था कि 25 मार्च को होने वाली सुनवाई के दौरान अदालत की मदद के लिए चुनाव आयोग के कोई जिम्मेदार अधिकारी अदालत में मौजूद रहें।

दरअसल आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू और 20 अन्य विपक्षी नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट में लोकसभा चुनावों के दौरान ईवीएम में सुरक्षा उपायों की मांग की है और चुनाव आयोग को निर्देश देने की गुहार लगाई है कि वो हर विधानसभा क्षेत्र में कम से कम 50 प्रतिशत मतदाता सत्यापित पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) की औचक गिनती करें।

चंद्रबाबू नायडू के अलावा, याचिका दायर करने वाले अन्य लोगों में शरद पवार, के. सी. वेणुगोपाल, डेरेक ओ’ब्रायन, शरद यादव, अखिलेश यादव, सतीश चंद्र मिश्रा, एम. के. स्टालिन, टी. के. रंगराजन और अरविंद केजरीवाल आदि ने ये याचिका दाखिल की है।

उन्होंने प्रस्तुत किया है कि देश भर के 7 (7 राष्ट्रीय दलों और 15 क्षेत्रीय दलों में से 6) चुनावी रूप से लगभग 70 – भारत के 75% लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। वो इस याचिका को चुनाव आयोग की गाइडलाइन को खत्म करने के लिए दिशा निर्देश देने के लिए दायर कर रहे हैं जो कि वीवीपीएटी के साथ मिलान को प्रदान करता है। इसके तहत किसी निर्वाचन क्षेत्र के बेतरतीब ढंग से चयनित केवल एक मतदान केंद्र के लिए ये औचक निरीक्षण आयोजित किया जाता है।

उन्होंने प्रति विधानसभा सेगमेंट में VVPAT का उपयोग करके कम से कम 50% इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के यादृच्छिक सत्यापन के लिए चुनाव आयोग को दिशा-निर्देश देने की मांग की है। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि शीर्ष अदालत ने माना था कि वीवीपीएटी “स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की एक अनिवार्य आवश्यकता है।”

हालांकि, वीवीपीएटी के संचालन के लिए वर्तमान में चुनाव आयोग की गाइडलाइन का पालन किया जा रहा है, जो वीवीपीएटी को शुरू करने के पूरे उद्देश्य को पराजित करता है और बिना किसी वास्तविक पदार्थ के इसे सिर्फ सजावटी व्यवस्था बनाता है।

याचिकाकर्ता स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के माध्यम से संविधान की बुनियादी संरचना को सुरक्षित रखने के कारण की तलाश करना चाहते हैं ताकि वो संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत गारंटीकृत नागरिकों के मौलिक अधिकारों से वंचित न हों। उन्होंने कहा कि ईवीएम और मतगणना संदेह से मुक्त नहीं हुई है और ऐसी विभिन्न घटनाएं हुई हैं जो आम जनता के मन में मतगणना / चुनाव प्रक्रिया के समग्र आचरण के प्रति अविश्वास पैदा करती हैं।

उन्होंने कहा कि वीवीपीएटी उन आशंकाओं को दूर करने के लिए एक उपयुक्त तरीका है और यह सुनिश्चित करता है कि लोकतंत्र और स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव, जो इस न्यायालय द्वारा भारत के संविधान के मूल ढांचे का एक हिस्सा बताए गए हैं, की रक्षा की जा सके।

कहा गया है कि वीवीपीएटी द्वारा सुनिश्चित की गई चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता एक ऐसा स्तंभ है जिस पर लोगों का विश्वास और भरोसा कायम है। इसलिए वर्तमान याचिका में ईवीएम के उपयोग में अतिरिक्त सुरक्षा उपायों के लिए अदालत के हस्तक्षेप की मांग की गई है।

साभार: livelaw की रिपोर्ट